बुधवार, 26 जून 2013

...तो क्या हम पड़ोसी देश चीन के साथ राशन की बात कर लें?'


प्रलय का शिलालेख


अनुपम मिश्र
अंतिम अपडेट 22 जून 2013 9:45 PM IST पर

सन् 77 की जुलाई का तीसरा हफ्ता। चमोली जिले की बिरही घाटी में आज एक अजीब सी खामोशी है। यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जलस्तर भी बढ़ता जा रहा है। उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है।

फिर भी चमोली-बद्रीनाथ मोटर सड़क से बाईं तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांत सा लग रहा है। आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थे, देख चुके थे। इनके घर, खेत व ढोर इस प्रलय में बह चुके थे। उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था। कोई एक मील चौड़ी और पांच मील लंबी इस घाटी में चारों तरफ बड़ी-बड़ी शिलाएं, पत्थर, रेत और मलबा भरा हुआ है, इस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है।

लेकिन सन् 70 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था। तब यहां यह घाटी नहीं थी, इसी जगह पर पांच मील लंबा, एक मील चौड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल ताल था-गौना ताल। ताल के एक कोने पर गौना गांव था और दूसरे कोने पर दुरमी गांव, इसलिए कुछ इसे दुरमी ताल भी कहते थे। पर बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए यह बिरही ताल था, क्योंकि चमोली-बद्रीनाथ मोटर-मार्ग पर बने बिरही गांव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था। ताल के ऊपरी हिस्से में त्रिशूल पर्वत की शाखा कुंवारी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटी-बड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था।

ताल के मुंह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धारा फिर से बिरही नदी कहलाती थी। जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनंदा में मिल जाती थी। सन् 70 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदल कर रख दिया।

दुरमी गांव के प्रधानजी उस दिन को याद करते हैं, ‘तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था। पानी तो इन दिनों में हमेशा ही गिरता है, पर उस दिन की हवा कुछ और थी।

ताल के पिछले हिस्से से बड़े-बड़े पेड़ बह-बह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे, ताल में� उठ रही लहरें उन्हें तिनकों की तरह यहां से वहां, वहां से यहां फेंक रही थीं। देखते-देखते सारा ताल पेड़ों से ढंक गया। अंधेरा हो चुका था, हम लोग अपने-अपने घरों में बंद हो गए। हम घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी होकर रहेगी।’ खबर भी करते तो किसे करते? जिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था। घने अंधेरे ने इन गांववालों को उस अनहोनी का चश्मदीद गवाह न बनने दिया, पर इनके कान तो सब सुन रहे थे। प्रधानजी बताते हैं, ‘रात भर भयानक आवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठंडा पड़ गया।’ ताल के किनारे की ऊंची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल फूट चुका है, चारों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें, हजारों पेड़ों का मलबा, और रेत-ही-रेत पड़ी है।

ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगह-जगह भूस्खलन हुआ था, उसके साथ सैकड़ों पेड़ उखड़-उखड़ कर नीचे चले आए थे। इस सारे मलबे को, टूट कर आने वाली बड़ी-बड़ी चट्टानों का गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गया, सतह ऊंची होती गई और फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुंह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फेंका और देखते-ही-देखते सारा ताल खाली हो गया। घटना स्थल से लगभग तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था।

गौना ताल ने एक बहुत बड़ी प्रलय को अपनी गहराई में समा कर उसका छोटा सा अंश ही बाहर फेंका था। उसने सन् 70 में अपने आप को मिटा कर उत्तराखंड, तराई और दूर मैदान तक एक बड़े हिस्से को बचा लिया था। वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन 70 की बाढ़ की तबाही के आंकड़े कुछ और ही होते। लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिए ही हुआ था।

ठीक आज की तरह ही सन् 1893 तक यहां गौना ताल नहीं था। उन दिनों भी यहां यह विशाल घाटी ही थी। सन् 93 में घाटी के संकरे मुंह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिरकर अड़ गई थी। घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुंह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरे-धीरे गहरी घाटी में फैलने लगा। अंग्रेजों का जमाना था, प्रशासनिक क्षमता में वे सन् 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए। उस समय जन्म ले रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गांव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे। एक साल तक वे नदियां ताल में पानी भरती रहीं।

जलस्तर लगभग 100 गज ऊंचा उठ गया। तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया। बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई। ताल सन 1894 में फूट पड़ा, पर सन् 1970 की तरह एकाएक नहीं। किनारे के गांव खाली करवा लिए गए थे, प्रलय को झेलने की तैयारी थी। फूटने के बाद 400 गज का जल स्तर 300 फुट मात्र रह गया था। ताल सिर्फ फूटा था, पर मिटा नहीं था। गोरे साहबों का संपर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आसपास की चोटियों पर बसे गांवों से भी बना रहा। उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिए एक कोर्ट लगाता था।

विशाल ताल साहसी पर्यटकों को भी न्यौता देता था। ताल में नावें चलती थीं। आजादी के बाद भी नावें चलती रहीं। सन 60 के बाद ताल से 22 किलोमीटर दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बद्रीनाथ मोटर-सड़क बन जाने से पर्यटकों की संख्या भी बढ़ गई। ताल में नाव की जगह मोटर-बोट ने ले ली। ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन 60 से 70 के बीच में कटते रहे। ताल से प्रशासन का संपर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के नाम पर कायम रहा-वह ताल के इर्द-गिर्द बसे 13 गांवों को धीरे-धीरे भूलता गया। फिर सन् 70 जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया। ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। सन् 1894 में गौना ताल के फटने की चेतावनी तार से भेजी थी, पर सन् 1970 में ताल फटने की ही खबर लग पाई।

बहरहाल, अब यहां गौनाताल नहीं है। पर उसमें पड़ी बड़ी-बड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थायी शिलालेख खुदा हुआ है। इस क्षेत्र में चारों तरफ बिखरी चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि जंगलों खासकर नदियों के जलागम क्षेत्र में खड़े जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है। पर हम ‘शिलालेख’ को पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन उत्तराखंड का ‘चिपको’ आंदोलन न केवल इस ‘शिलालेख’ को पढ़ चुका है, वह अपनी सीमित शक्ति और अति सीमित साधनों से इसकी हिदायतों पर अमल भी कर रहा है।

जुलाई के तीसरे हफ्ते में आंदोलन के कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी लगातार बारिश के बीच गौना ताल तक पहुंची और उसने ताल के मलबे के बीच से बह रही बिरही नदी के किनारे-किनारे मजनूं नामक एक पेड़ की कोई तीन हजार कलमें रोपीं...मजनूं (विलों) के पेड़ में नदी के किनारों को बांध कर रखने का विशेष गुण है। इस इलाके में मजनूं का पेड़ पहली बार ही लगाया गया है।

गाड़ी गांव में रहने वाले आजाद हिंद फौज के एक भूतपूर्व सैनिक ने 1977 के जून माह में सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा था कि 'क्या आप हम तेरह गांवों के लोगों को भी अपनी प्रजा मानते हैं? यदि हां तो हमारे लिए बाढ़ के इन दिनों में खाने-पीने का इंतजाम करवाइए। हम मुफ्त में नहीं, लेकिन उचित दाम और उचित दूरी पर राशन मांग रहे हैं। यदि आप राशन नहीं दिलवा सकते तो क्या हम पड़ोसी देश चीन के साथ राशन की बात कर लें?'

1977 में एक भूतपूर्व सैनिक की लिखी यह बात आज भी प्रासंगिक है। आज भी लोग राशन-पानी के लिए तड़प रहे हैं। लेकिन तब भूतपूर्व सैनिक के गुस्से में दम था। आज उत्तराखंड के अनेकों गांवों में वैसा ही गुस्सा उबल रहा है। बाढ़ को उतरने में समय लग सकता है। इस दौरान प्रशासन को किसी भी कीमत पर सस्ता गल्ला बांटने की कोई स्थायी व्यवस्था कर देनी चाहिए और अगले बरस ऐसे असंख्य गांवों में बाढ़ आने से पहले ही ठीक मात्रा में राशन पहुंचाने की स्थायी व्यवस्था बना लेनी चाहिए। बाढ़ तो हर बरस आएगी-जब तक हम गौना ताल के मलबे पर लिखे शिलालेख को पढ़ नहीं पाएंगे, पढ़कर समझ नहीं पाएंगे। -सं.

http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/columns/disaster-of-nineteen-seventy-seven/

सोमवार, 10 जून 2013

A H wheeler, Mumbai Central, Railway Heritage

यूँ तो कई बार मुंबई सेंट्रल स्टेशन जाना हुआ। ८ जून शाम ११.३० बजे जब बुक स्टाल बंद थी तो उस पर लगा पट्टा पढ़ा तो ज्ञात हुआ कि A H Wheeler का बुक स्टाल Indian Railway Heritage है और १९०५ में इंग्लैंड से लाया गया था। व्हीलर, जो स्टेशन में घुसते ही बाएं हाथ की तरफ है, की मुख्य खासियत पट्टे में लिखी है। उसी की तस्वीरें: -





कभी जाएँ तो जरुर देखें। 


शुक्रवार, 24 मई 2013

महानगर की परिभाषा- जयप्रकाश चोकसे


एक शहर का बदलना बहुत बड़ी घटना होती है। यह केबल भव्य गगनचुम्बी इमारतों से स्पष्ट नहीं होता। सड़कों के चौड़ा होने से पता नहीं चलता, तवायफों और दलालों की बढ़ती मांग से जरुर कुछ आभास होता है, परन्तु असली परिवर्तन तो यह है कि सीमेंट की सड़कों से सख्त पडोसी का दिल हो जाए और जनाजे में केबल निकट रिश्तेदार ही बेमन से शामिल हों- संवेदनाओं के घटने से जाहिर हो जाता है कि ये महानगर है।

जब आपके घरों से अधिक लोग सड़कों पर सोते नज़र आयें, भिखारियों की संख्या बढ़ जाए, समझ लीजिये आपका शहर महानगर हो गया है। जब मनुष्य के व्यव्हार में क्रूरता आ जाए और मानवतावादी संस्थाएं खंडहर नज़र आयें, जब शहर कभी सोए ही नहीं, समझ लीजिये वह व्यस्क हो गया, महानगर हो गया।

शुक्रवार, 10 मई 2013

महाभारत : एक कथा


जीने के कई कारण हो सकते हैं और मरने के लिए चंद बहाने काफी हैं। आज के युग में यह संवेदनहीनता ही है कि लोग शर्म से भी नहीं मरते और सम्मान से भी नहीं जीते, केवल जीने का स्वांग करते हैं। हम सब लाइफ-लाइफ खेल रहे हैं।

महाभारत के अनुशासन पर्व में एक कथा इस प्रकार की है कि ऋषि देवशर्मा को अपनी सुंदर पत्नी रुचि की रक्षा की चिंता है। उन्हें भय है कि इंद्र उनकी पत्नी पर मोहित हो सकते हैं। एक बार यात्रा पर जाते समय वह शिष्य विपुल पर रुचि की रक्षा का भार डालते हैं। विपुल इंद्र को आते देख यह जानते हुए भी कि वह इंद्र का सामना नहीं कर पाएगा, गुरुपत्नी की आंखों में झांकते हुए अपनी ऊर्जा उनके अवचेतन में प्रवाहित कर देता है और इंद्र के आने पर रुचि के माध्यम से विपुल की आवाज ही गूंजती है। इंद्र समझ जाते हैं कि विपुल ने रुचि के सारे अवचेतन और शरीर पर कब्जा जमा लिया है और वह वापस लौट जाते हैं। विपुल अपने गुरु से कैसे कहे कि रक्षा का केवल यही उपाय था कि वह गुरुपत्नी की चेतना में पैठ जाए, परंतु यह भी एक किस्म का सहवास है और शायद उस क्रिया का शिखर है। 

गुरु कहते हैं कि किसी भी कार्य के परिणाम का आकलन इस पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का उद्देश्य क्या है, उसकी नीयत क्या है! विपुल द्वारा गुरुपत्नी की रक्षा के लिए किए गए प्रयास को पाप नहीं कहा जा सकता। स्पष्ट है कि अवचेतन पर अधिकार के प्रयोग सदियों से हो रहे हैं।


गुरुवार, 2 मई 2013

यूं गुजरे...सौ बरस सिनेमा के


यूं गुजरे...सौ बरस सिनेमा के- यूनुस खान 

भारत में सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होना एक मौक़ा है इससे जुड़ी कुछ अनमोल यादों को ताज़ा कर लेने का। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आज से सौ बरस पहले यानी सन 1913 में भारत पर ग़ुलामी की भयानक बेडियां कसी थीं। 1857 के विद्रोह को नाकाम हुए भी आधी सदी से ज़्यादा वक्‍त बीत चुका था। फ्रांस के ल्‍यूमियेर ब्रदर्स ने ‘सिनेमेटोग्राफ’ का आविष्‍कार किया और उससे तैयार की गयी अपनी पहली फिल्‍मों को 28 दिसंबर 1895 को पेरिस के एक कैफे में सार्वजनिक रूप से दिखाया। 7 जुलाई 1896 को उन्‍होंने बॉम्‍बे के वाटसन होटेल में अपनी इन फिल्‍मों का प्रदर्शन किया। तब किसी को अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा कि एक दिन अरब सागर के किनारे बसा ये शहर फिल्‍मों का ऐसा गढ़ बन जायेगा, जहां हर साल दुनिया की सबसे ज्‍यादा फिल्‍में बनाई जायेंगी।

दादा साहेब फालके से भी पहले सावे दादा यानी हरिश्‍चंद्र सखाराम भाटवडेकर ने मुंबई में लघु फिल्‍मों का निर्माण किया था। जब मुंबई में ल्‍यूमियेर ब्रदर्स की फिल्‍में प्रदर्शित की गयीं, तब तक सावे दादा को फोटोग्राफी के व्‍यवसाय में तकरीबन पंद्रह साल हो चुके थे। उन्‍होंने इंग्‍लैंड से तब का मूवी-कैमेरा यानी सिनेमेटोग्राफ़ मंगवाया। उन्‍होंने इससे कुछ ‘न्‍यूज़-रील’ फिल्‍माईं। मुंबई के प्रसिद्ध हैंगिंग-गार्डन में उस समय के दो मशहूर पहलवानों पुंडलीक दादा और कृष्‍णा नाहवी के बीच हुए कुश्‍ती के मुक़ाबले को फिल्‍माया। उस समय फिल्‍म को प्रोसस होने के लिए इंग्‍लैंड भेजा जाता था। इसके बाद उन्‍होंने अलग-अलग विषयों पर कुछ और‍ फिल्‍मांकन किए। जिनमें से कुछ को भारत के पहले वृत्‍तचित्र माना जाता है। ठीक इन्‍हीं दिनों कोलकाता में फोटोग्राफर हीरालाल सेन ने एक ओपेरा ‘द फ्लावर ऑफ पर्शिया’ के एक दृश्‍य ‘द डान्सिंग सीन’ को फिल्‍माया। अब तक छोटी-मोटी घटनाओं का फिल्‍मांकन तो हो रहा था पर कथाचित्र बनाने की कोई कोशिश नहीं की गयी थी।

ये प्रयास सन 1912 में किया गया। सावे दादा ने निजी कारणों से अपना कैमेरा बेच दिया था। जिससे ए.पी.करिन्दकर, एस.एन.पाटनकर और वी.पी.दिवेकर ने 1000 फिट लम्बी एक छोटी कथा-फिल्‍म ‘सावित्री’ बनाई। तकनीकी कारणों से ये फिल्‍म प्रदर्शित ना हो सकी। इन्‍हीं दिनो मुंबई के नानाभाई चित्रे के प्रयासों से ‘पुंडलीक’ नामक एक नाटक को फिल्‍माया गया। आठ हज़ार फुट लंबी इस फिल्‍म को मुंबई में प्रदर्शित भी किया गया। पर भारत की पहली फीचर फिल्‍म बनाने का श्रेय गया धुंडीराज गोविंद फालके को। जो एक ज़माने में अपना प्रिंटिंग-प्रेस भी चलाते थे। पर साझेदारों से विवाद की वजह से उन्‍होंने ये काम बंद कर दिया और फिल्‍म बनाने के अपने सपने को पूरा करने में जुट गये। दरअसल उन दिनों मुंबई में मानिक सेठना नामक एक उद्योगपति ‘टूरिंग सिनेमा कंपनी’ के ज़रिये बाहर से फिल्‍में मंगवाकर उन्‍हें किसी हॉल में नहीं बल्कि खुले मेदानों में पेशेवर रूप से प्रदर्शित करते थे। क्रिसमस पर ऐसे ही एक प्रदर्शन में दादा साहेब फालके ने एक मूक फिल्‍म देखी ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्‍ट‘ जिससे उन्‍हें सिनेमा बनाने की प्रेरणा मिली। उन्‍होंने एक दोस्‍त के पास अपनी इंश्‍योरेन्‍स पॉलिसी गिरवी रखी और क़र्ज़ लेकर इंग्‍लैंड गये ताकि सिनेमा बनाने के ज़रूरी उपकरण ख़रीदें और प्रश भी लें। ईसा-मसीह पर देखी फिल्‍म से उन्‍हें प्रेरणा दी कि वो भारतीय पौराणिक विषयों पर फिल्‍म बनायेंगे। इस तरह ‘राजा हरीश्‍चंद्र’ का बीज पड़ा। तमाम बाधाओं को पार करते हुए दादा साहेब फालके ने 3 मई 1913 को अपनी इस फिल्‍म को प्रदर्शित किया। क़रीब 3700 फुट लंबी यानी चार रील की इस फिल्‍म को मुंबई के कोरोनेशन सिनेमा में प्रदर्शित किया गया और इस तरह फालके की परेशानियों का दौर ख़त्‍म हो गया। आपको बता दें कि फालके के इसी संघर्ष पर मराठी फिल्‍मकार परेश मोकाशी ने सन 2010 में अपनी फिल्‍म ‘हरीश्‍चंद्राची फैक्‍ट्री’ बनाई थी। इस फिल्‍म को ऑस्‍कर पुरस्‍कारों तक भेजा गया था।

आपको बता दें कि दादा साहेब फालके को ‘राजा हरीश्‍चंद्र’ के लिए महिला कलाकार नहीं मिले थे। इसलिए सालुंके नामक एक नौजवान को तारामती की भूमिका दी गयी थी। भारतीय फिल्‍मों की पहली अभिनेत्री बनीं कमलाबाई गोखले जिन्‍होंने 1914 में आई दादासाहेब फालके की तीसरी फिल्‍म ‘भस्‍मासुर मोहिनी’ में काम किया था। आज के ज़माने के मशहूर अभिनेता विक्रम गोखले उन्‍हीं के पोते हैं। अब बात कर ली जाये टॉकीज़ों की। जैसा कि हमने बताया कि शुरूआत में फिल्‍में किसी हॉल या मैदान में दिखा दी जाती थीं। भारत का पहला स्‍थाई सिनेमाहॉल सन 1907 में जे.एफ.मदान ने बनाया था, जिसका नाम था एलफिन्‍स्‍टन पिक्‍चर पैलेस। बाद में ये चैप्‍लिन सिनेमा के नाम से जाना गया।

भारत में सिनेमा ने बोलना शुरू किया आर्देशिर ईरानी की फिल्‍म ‘आलम-आरा’ से, इसके नायक थे मास्‍टर विट्ठल और नायिका थीं जुबेदा। 14 मार्च 1931 को ये फिल्‍म मुंबई के मै‍जेस्टिक थियेटर में प्रदर्शित की गयी थी। इस फिल्‍म में वज़ीर मुहम्‍मद ख़ान ने भारतीय सिने इतिहास का पहला गाना गाया—‘दे दे ख़ुदा के नाम पर, गर ताक़त हो देने की’। इसी फिल्‍म में ज़ुबेदा ने गाया—‘बदला दिलवायेगा यारब तू सितमग़ारों से’। इन गानों की रिकॉर्डिंग तो उपलब्‍ध नहीं है पर बाद में किसी इंटरव्‍यू में जुबेदा ने इस गीत को गुनगुनाया था, उसकी रिकॉर्डिंग ज़रूर उपलब्‍ध है। आर्देशिर ईरानी को भारत की पहली रंगीन फिल्‍म बनाने का श्रेय भी जाता है। उन्‍होंने सन 1937 में 137 मिनिट लंबी कलर फीचर फिल्‍म ‘किसान कन्‍या’ बनाई थी। हालांकि भारत में रंगीन सिनेमा बनाने का चलन काफी देर से शुरू हुआ। लंबे समय तक फिल्‍में श्‍वेत-श्‍याम ही रहीं। यहां ये बता देना ज़रूरी है कि वी. शांताराम ने सन 1933 में ‘सैरन्‍ध्री’ बनाई थी। पर इसकी प्रोसेसिंग भारत में नहीं जर्मनी में की गयी थी। सन 1932 में आई मदन थियेटर्स की फिल्‍म ‘इंद्रसभा’ भारत में सबसे ज्‍यादा गानों वाली फिल्‍म मानी जाती है। इसमें कुल 71 गाने थे। मास्‍टर निसार और कज्‍जन के अभिनय वाली इस फिल्‍म के निर्देशक थे जे.जे.मदान। संगीतकार थे नागरदास नायक। भारत की पहली सिनेमास्‍कोप फिल्‍म थी सन 1959 में आई गुरूदत्त की ‘काग़ज़ के फूल’।

तीसरे और चौथे दशक में मुंबई, कोलकाता और चेन्‍नई भारत में फिल्‍में बनाने के मुख्‍य केंद्र बन चुके थे। बी. एन. सरकार के ‘न्‍यू थियेटर्स’ कोलकाता ने इस दौर में ‘चंडीदास’ (1934/निर्देशक नितिन बोस/कलाकार कुंदनलाल सहगल और उमा शशि), ‘देवदास’ (1935/निर्देशक पी.सी.बरूआ/कलाकार कुंदनलाल सहगल, जमुना), कपाल कुंडला (1939/निर्देशक नितिन बोस/ कलाकार शैलेन चौधरी और लीला देसाई) और मुक्ति (1937/निर्देशक पी.सी.बरूआ/कलाकार कानन देवी, पी आ) जैसी फि बना ली थीं। जबकि मुंबई में हिमांशु रॉय की ‘बॉम्‍बे टॉकीज़’ ने ‘जीवन नैया’ (1936/निर्देशक फ्रेंज ऑस्टिन) और ‘अछूत कन्‍या’ (1936 निर्देशक फ्रेंज ऑस्टिन) जैसी फिल्‍में प्रदर्शित कर ली थीं। स्‍टूडियो सिस्टम स्‍थापित हो गया था। कुंदनलाल सहगल, अशोक कुमार, देविका रानी, दिलीप कुमार जैसे स्‍टार सामने आने लगे थे। इसके अलावा सरस्‍वती देवी, आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और खेमचंद प्रकाश जैसे संगीतकारों ने अपने क़दम बढ़ाने शुरू कर दिये थे। यानी इतना तय हो गया था कि अब भारतीय सिनेमा तरक्‍की की राहों पर जाने वाला है।

लेखक विविध-भारती में कार्यरत हैं।

गुरुवार, 14 मार्च 2013

Stress!!


An email forward..

Stress is a normal part of life. Everyday we  face with countless task that they sometimes become over-whelming and cause us to stress out. Here are 15 ways  to overcome daily stress and maintain a happy life.

1. Eliminate unnecessary commitments
2. Stop over analyzing and start doing.

3. Do one thing at a time.
4. Learn to say no and really mean it.

5. Don’t compare yourself to others. Life is not a contest.
6. Find reason to laugh. Even laughing at yourself helps.

7. Let go of trying to control everything.
8. Walk away from anything or anyone that makes you miserable.

9. Practice gratitude. That you are alive is still a gift.
10 Control over expectation to avoid disappointment.

11.Stop being a perfectionist and move on.
12. Don’t stress out trying to get everyone to agree with you.

13. Stop longing for the past and start living in the present.
14. Don’t trade sleep for work and don’t trade family time for work. Be balanced.

15. Help others whenever it is within your power to do so.

Peace of mind is something everyone should strive to attain, to some it comes easily, for others it takes more learning and practice time.

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

उपाध्यक्ष शहर आया!!




आज सुबह मुंबई महानगर ने जब आँखें खोली तो पता चला की सबके चहेते 45 वर्षीय युवा राहुल गाँधी आज अपने एक दिन के प्रवास पर मुंबई आ रहे हैं। पूरा कांग्रेसी कुनबा उनके स्वागत के लिए पलक पावडे बिछाए इंतजार में है। कई युवाओं की धड़कन इसलिए तेज़ है क्योंकि युवाओं की धड़कन आज शहर में है। और कई युवा तो धड़कन तेज़ होने के कारण डॉक्टर की सलाह ले रहे हैं। मेरे एक 45 वर्षीय अंकल अपने आपको आज युवा महसूस करे रहे हैं। 

सड़कों पर लगे पोस्टर गवाह है कि नेता सड़क का है और आम आदमी का प्रिय है। मुंबई के चौराहे/सड़क पर श्री राहुल गाँधी के पोस्टर गन्दी सड़क को चमका रहे हैं और अलसाए शुक्रवार को गति दे रहे है। पोस्टरों पर श्री राहुल गाँधी भिन्न भिन्न मुद्रा में शोभनीय है। कई बार लगता है कि शायद चश्मे का विज्ञापन है या मर्दों वाली क्रीम का।कांग्रेसी नेताओं के फोटो पोस्टर पर हैं ऐसा लगता है सबने नहा धोकर फोटो निकाला है। पर राहुल गाँधी के सामने सब फीके हैं.कई बार लगा की ऑटो रिक्शा से उतरकर राहुल गाँधी के पोस्टरों की फोटो ले लूं। पर चलती सड़क पर ये मुनासिब ना हुआ। कहीं पढ़ा सुना सा हैं कि मुंबई मे सड़क चौराहों पर पोस्टर लगाना का नियम क़ानून महानगरपालिका ने बनाये है पर शायद आज वो लागू नहीं है। देश के युवराज आ रहे हैं। नियम है पर जरा समझो।

मुंबई लोकल ट्रेन तैयार है और सभी एटीएम मशीनों में पैसे लबालब भर दिए गए हैं। अंदेशा है की कहीं श्री राहुल किसी एटीएम से पैसे निकालकर  लोकल ट्रेन में ना निकल पडें। पुलिस बंदोबस्त भी रोज़ से ज्यादा है।

जिन रास्तों से श्री राहुलजी गुजरेंगे आम जनता से अनुरोध है कि वहां से ना गुजरे और रास्ता साफ़ होने दें देश का भविष्य वहां से निकल जाए फिर वर्तमान निकले। 

शायद दौरा बहुत ही महतवपूर्ण है क्योंकि उपाध्यक्ष बनने के बाद पहला दौरा है और चुनाव की जिम्मेदारी भी सर पर है इसलिए सभी लोग सीरियस रहें और अपनी जिम्मेदारियों को समझें। और हाँ इसे दौरों की शुरुआत समझा जाए।