सोमवार, 28 नवंबर 2011
आर्थिक उदारवाद का अगला कदम....
आज जब भारत की आर्थिक नीति संपूर्ण उदारवाद के पक्ष में है तब ऐसा लगता है कि गगन चुम्बी इमारतों के बीच में भारत देश खो सा गया है..पैसे कमाने की दौड़ में नैतिक मूल्य पीछे ही छूट गए हैं..भविष्य में वालमार्ट की आड़ में किराना दुकान ढूदने से न मिलेगी..माचिस की एक डब्बी लेने रात में ९.३० के बाद कहाँ जायेंगे.. ..आर्थिक उदारवाद के इस चरण में शायद :- "गुजस्ता जंग में पैकर ही जले, जल न जाएँ इस बार परछाईयाँ भी"...कृषि प्रधान देश में कृषि में सुधार के लिए वालमार्ट को आमंत्रित करना समझ से परे है..खुली अर्थव्यवस्था में फायदे है पर नुक्सान के बारे में नहीं सोचा जा रहा है..खुली अर्थव्यवस्था में अमेरिका के जुखाम का असर भारत में संक्रामक बीमारी की तरह फैलता है..ओबामा अगर चुनाव हारते है तो विदेशी मुद्रा भंडार कम हो जाएगा ये बात समझ से परे है..यहाँ पर तकनीकी विकास की जगह चंद रिटेल कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है..अगर हमारा गेंहू सड़ रहा है तो हम अमेरिका को बोले की आप उसे भरने बर्तन दे दो या ढकने त्रिपाल दे दो ये बात कुछ अटपटी लगना स्वभाभिक है..अमेरिकी मंदी और 21000 अरब रूपये (वालमार्ट का कुल कारोबार ) से किसी भी चीज को खरीदने की ताकत को भी नहीं भूलना चाइये...अगर हम आज़ादी के इतने वर्षों बाद अपना अनाज सुरक्षित रखना नहीं सीख पाए ..लोगों को २ जून रोटी उपलब्ध नहीं करा पाए तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से अनाज सुरक्षित हो जाएगा या गरीब को रोटी मिलेगी..सोचना बेमानी है..१ करोड़ लोगों को रोजगार देने के लिए ५ करोड़ असंगठित लोगों को बेरोजगार करना किसी भी कल्याणकारी और समाजवादी अर्थव्यवस्था का प्रतीक नहीं है..ये सिर्फ चंद पूंजीवादी लोगों का अपना हित है..
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