शुक्रवार, 25 नवंबर 2011
थप्पड़ क़ी कहानी...
आखिर थप्पड़ क्यों है? किसको है? ये समझने की महती आवश्यकता है..ये बात सिरे से ख़ारिज नहीं की जा सकती की पवार साहब एक दिग्गज राजनेता है..तो थप्पड़ के लिए उनका ही गाल चुना जाना क्या इस बात का प्रतीक है कि सभी राजनेताओं को थप्पड़ पड़ चूका है..अगर इसे इस बात का प्रतीक नहीं माना जाता तो शायद भविष्य में ऐसी और भी घटनाएँ संभव हैं..जनता परेशां है इस बात को स्वीकार करना होगा..क्यों है? ये अगर मालूम नहीं है तो तो ऐसी गूंज भविष्य में भी सुनाई देंगी..गुस्सा सभी को आता है राहुल गाँधी को भी आम आदमी को भी..राहुल गाँधी का गुस्सा भाषंड के बाद ख़तम हो जाता है..और वहां से आम आदमी का गुस्सा बढ़ जाता है..जनता अपने नुमायेंदे चुन के भेजती है सुशासन के लिए ये ही तो लोकशाही है..पर जब नुमएंदे इस शासन के फायदे अपने तक या अपने करीबियों तक ही सीमित रखते है..तब गुस्सा आना स्वभाभिक है..क्यों आज तक ऐसी पहल नहीं की गयी कि जनता सुख चैन से रह सके..गरीबी हटाओ का नारा इंदिराजी ने दिया तो राहुल के समय तक अगर वो कारगर सिद्ध नहीं हो पाया तो ये मान लेना उचित है कि निकम्मी सरकार है..थप्पड़ मारा तो हाथ से गया है पर निकला आदमी के मन कि बेचैनी से है..उपाय तो करने होंगे..बेचैनी तो रोकना होगी..
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