गुरुवार, 17 नवंबर 2011
मजदूरी, गुलामी और मज़बूरी--मुंबई लोकल में
पनवेल-अँधेरी मार्ग पर सुबह के समय सीमित लोकल ट्रेन होने के कारण भीड़ बडती चली जा रही है..इस कारण सोचा की जब नेरुल से पहले दर्जे के डब्बे में यात्रा करना मुश्किल हो रहा है तो क्यों ना दुसरे दर्जे में जाया जाए जहां भीड़ कम होती है या आगे के स्टेशन से होती है..अगर दो शब्दों में कहें तो "मजा आया"...लगा जैसे की ये पूरा भारत ही बैठा है..और में भारत दर्शन कर रहा हूँ..कोई सीए, कोई ऍमबीए, कोई सरकारी कर्मचारी, कई बेरोजगार, कई मजदूर लेकिन कोई भी मजबूर नहीं..सब खुश..मस्त..सब एक दूजे से बात चीत करते हुए...खुद खड़े होकर पहले से खड़े व्यक्ति को बैठने जगह देना..शिस्टाचार..वही पहले दर्जे के डब्बे में सभी मजबूर, गुलामी की मानसिकता लिए..अंगरेजी अख़बार के पन्ने उलटते हुए...लैपटॉप खोल कर दुनिया के सबसे व्यस्त व्यक्ति का कीर्तिमान बनाते हुए..जीडीपी में सबसे ज्यादा योगदान देते हुए और खुद से ही बेईमानी करते हुए..फसबूक पर मस्ती चालू है..ऑफिस का लैपटॉप है..हम बैठे हैं सीट दुसरे को क्यों दें.....डर है की कही पोजिसन ना चली जाए...ऐसा ही तो ऑफिस में करते है मेनेजर हैं..गुलाम है...सो लेते हैं ऑफिस में बहुत काम है देर रात तक बैठना है..तो असली भारत कहाँ है गुलामी में कि ख़ुशी में और मस्ती मैं..
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