वर्ष २०११ का आज आखिरी दिन है. हमेशा से ही ये विचार रहा है कि क्या कोई दिन आखिरी दिन हो सकता है जबकि समय निरंतर चलता रहता है. बहरहाल, कैलेंडर बदलते रहने चहिये जीवन में नयापन आता है. तो क्या जीवन में नयापन लाने के लिए हमें साल के अंतिम दिन का इंतजार करना चाहिए ये बात दिमाग में आती है. कुछ लोग नए वर्ष की शुरुआत नए तरीके से करते है भ्रमण पर निकल जाते है पुराने साल में और वापस आते है नए साल में. अच्छी बात है. नवयुवक ३१ की रात में पार्टी करते हुए नए साल का स्वागत करते हैं. बताया जाता है कि ३१ दिसम्बर को शराब कि बिक्री महीने की बिक्री के बराबर हो जाती है. फायदा किसका? साथ ही ये बात समझ से परे है कि वही शराब जिसे कई लोग दुःख भुलाने को पीते हैं कुछ लोग सुख के पलों में पीते हैं. ये शराब का जादू है या व्यक्ति की मानसिकता का?
बहरहाल, २०११ का वर्ष मेरे जीवन में एक अच्छा साल था. इस वर्ष मैंने बहुत सीखा. हालाकि मैं पैसे कमाने कि दौड़ में शामिल नहीं रहा पर इस बात का संतोष हमेशा रहेगा कि ज्ञान पाने कि दौड़ में मैं प्रतिभागी था. जय प्रकाश चोकसे जी, जो पिछले १७ वर्षों से दैनिक भास्कर में "परदे के पीछे" स्तम्भ लिखते आ रहे है, ने मुझे अपने लेखों के माध्यम से जीवन चलने और जीने कि राह दी और सिखाया कि अगर आपके विचार सकारात्मक और शुद्ध है तो आपको अड़ियल बनना पड़ेगा क्योंकि इस भौतिकवादी संसार में विचारों में प्रतिबद्धता को जगह नहीं है और वही व्यक्ति आगे जा सकता है जिनके विचारों में लचीलापन है. उनके माध्यम से मुझे फिल्म जगत कि कई उनछुई जानकारियां और बारीकियां सीखने मिली जिन्हें में नज़र अंदाज़ कर देता था. सीखा की फ़िल्में मनोरंजन से कही आगे हैं अगर उन्हें सिर्फ मनोरंजन की नज़र से ना देखा जाए तो जीवन की पाठशाला हैं. मेरे एक मित्र के माध्यम से मुझे शायद चोकसे साहब से मिलने का अवसर २०१२ साल में मिल सकता है. इंतजार है...
जी न्यूज़ के एडिटर पुण्य प्रसून वाजपेयी के लेखों के माध्यम से मुझे बहुत दुनिया को अलग नज़र से देखने का नजरिया मिला और NDTV के रवीश कुमार के माध्यम से मुझे दिमाग खोल देने वाले विचार मिले . अरविन्द केजरीवाल की सादगी, ज्ञान और कटिबद्धता ने मुझे ताकत दी और बताया की उम्मीद की जा सकती है. इन सभी महानुभावों का शुक्रिया.
बीते वर्ष में मैंने अपने व्यक्तित्व का विवेचन किया और सबसे ज्यादा आलोचना मैंने स्वयं से स्वयं की करी है. जिंदगी ढोने की बजाय जीना सार्थक है ऐसा समझा है. पर जीना है तो कैसे ये उस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति को वही करना चाहिए जो उसे अच्छा लगे ना कि दुसरे को. मैंने जाना कि जिस व्यक्ति के जीवन में सिद्धांत होते हैं (लोग जिन्हें ढर्रे कहते हैं) वो व्यक्ति अपना जीवन ज्यादा संतोषी से जीता है (हालाकि संघर्ष करना पढता है..मजा तो वहीं है) बजाय उसके जो भौतिकता में अपने सिद्धांत रोज बदलता है. बीते वर्ष में ऐसी कई बातों/घटनाओं का मैंने विवेचन किया. और किसी भी घटना के पीछे के सत्य को जानने की कोशिश में बहुत सी अच्छी- बुरी बातें जानने और समझने का मौका मिला. हालाकि इस प्रक्रिया में मुझे कई लोगों से किनारा करना पढ़ा. मगर अफ़सोस नहीं है. क्योंकि कई अच्छे लोग मिले भी.
कोई भी चीज गलत नहीं है सब अपनी जगह सही हैं. साथ ही हर व्यक्ति का द्रष्टिकोण समान होना कदापि जरुरी नहीं है और सबको दुनिया अपनी नज़रों से साफ़ दिखती है. हम किसी को अपना चश्मा देंगे तो नज़र ख़राब होना निश्चित है. ऐसे वक़्त हमें किसी का चश्मा उधार लेना भी नहीं चाहिए.
मैं उन सभी व्यक्तियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मुझे गत वर्ष में मार्गदर्शित किया.
आशा करता हूँ की Steve Jobs का ये कथन जो कल के Economic Times में छपा था....शायद मुझे आने वाले वर्षों में रौशनी देगा.
I never worried about money. I grew up in a middle-class family, so
I never thought I would starve. And I learned at Atari that I could be an okay
engineer, so I always knew I could get by. I was voluntarily poor when I was in
college and India, and I lived a pretty simple life even when I was working. So
I went from fairly poor, which was wonderful because I didn’t have to worry
about money, to being incredibly rich, when I also didn’t have to worry about
money. I watched people at Apple who made a lot of money and felt they had to
live differently. Some of them bought Rolls-Royce and various houses, each with
a house manager and then someone to manage the house managers. Their wives got
plastic surgery and turned into these bizarre people. This was not how I wanted
to live. Its crazy. I made a promise to myself that I’m not going to let this
money ruin my life.
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