सोमवार, 16 जनवरी 2012

दिल के बारे में..

चोकसे साहब ने १४ जनवरी को अपने लेख में दिल के बारे में बहुत कुछ लिखा है..उसके ही कुछ अंश : -


लोकप्रिय धारणा तो यह है कि दिल और दिमाग में द्वंद्व रहता है। भीतरी संघर्ष को ठोस प्रतीक देने के लिए दिल-दिमाग के संघर्ष की बात की जाती है, जबकि दिमाग के ही दो हिस्से हैं, जिनमें तर्क और भावना जन्म लेती है। अनेक लोग दिल को दिमाग पर तरजीह देते हैं, जबकि सारी माया एक ही जगह उपजती है। इसमें ('साड्डा अड्डा') शायर (संदीप नाथ) दिल को सिरफिरा कह रहा है और भीतरी संघर्ष को नए ढंग से रेखांकित कर रहा है। दरअसल जीवन में इतना अजीबोगरीब होता है कि यह संसार तर्क या तथ्य के आधार पर नहीं चलते हुए उनकी काल्पनिक अवधारणाओं पर चलता है।


रोजमर्रा के जीवन में प्राय: कहते हैं कि फलां आदमी दिल का अच्छा है, गोयाकि अच्छाई को दिल से जोड़ा जाता है और बुराई को दिमाग की देन मानते हैं, जबकि नकारात्मकता और सकारात्मकता एक ही जगह उपजती है। दरअसल दिल को मुखौटा बनाकर दिमाग ही खेल रचता है।


विज्ञान कहता है कि दिल एक अच्छे पम्प की तरह खून सारे शरीर में भेजता है और तमाम इच्छाएं, विचार, सपने, डर इत्यादि दिमाग में ही बनते हैं और शायद इसी कारण ऊपरवाले ने शरीर की संरचना ऐसी की है कि दिल के ऊपर दिमाग है। मनुष्य सुविधाभोगी होता है और इसीलिए अपनी सहूलियत से काम करता है। इसीलिए कहते हैं कि 'दिल है कि मानता नहीं।'


लोकप्रिय धारणाएं सदियों के अनुभवों और गलत-सलत अवधारणाओं का संयोग होती हैं, परंतु तर्क की अवहेलना करना भी दिमागी फितरत ही है। यह दिमाग ही है, जो प्रशंसा से गर्राने लगता है और हेकड़ी के मारे ऊपर उठा होता है। दिमाग दुरुस्त भी होता है, जिसकी मरम्मत मौला ही करता है। यह दिमाग ही है, जिसके किसी एक बिंदु से चिंताएं जन्मती हैं, भूत-प्रेत जन्मते हैं और नैराश्य भी पैदा होता है। अनावश्यक चिंताओं के कारण वर्तमान पल हाथ से छिटक जाता है।

'साड्डा अड्डा' में ही शायर कहता है- 'ख्वाहिशों से आंख-मिचौली खेलता है दिल हमेशा, कश्मकश बंदिशें भी झेलता है दिल हमेशा, चेहरे पर इश्तेहार लगाकर घूमता है दिल, हसरतों की नुमाइश करके झूमता है दिल।'

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