जुर्म, सजा और आंसू शीर्षक से जय प्रकाश चोकसे ने एक शानदार लेख लिखा
है. रजत गुप्ता के माध्यम से जिस तरह उन्होंने जीवन के उतार चढाव को प्रस्तुत किया
है, वो अविश्वसनीय है. इसे पढने के बाद थोड़ी देर तो में स्तब्ध सा था
की किस तरह एक व्यक्ति अर्श से फर्श की तरफ आ रहा है. यहाँ ध्यान देने वाली बात है
की जज को भी रजत गुप्ता का ये कृत्य अविश्वसनीय लगता है, पर कानून सिर्फ सबूतों को
देखता है गुनाह करने वाले की तरफ देखने से पहले ही आँखों पर काली पट्टी चढ़ा लेता है.
शायद कानून को अँधेरा पसंद है.
जो काम रजत गुप्ता ने किया और जिसके लिए उन्हें दोषी माना गया, भारत देश
में प्रायः लोग प्रतिदिन ऐसा काम करते है, पर दोषी नहीं माने जाते. वरन सन्मान पाते
हैं. यहाँ बात ये है कि सभी लोग रजत गुप्ता नहीं है. यहाँ
रजत गुप्ता शायद दोषी नहीं हैं सिर्फ भारतीय हैं और समय रहते वो अपने आप को बदल ना
सके..
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जुर्म, सजा और आंसू
- जय प्रकाश चोकसे
जीवन किसी भी पटकथा से अधिक विचित्र होता है। इसके बावजूद संयोग वाली
फिल्मों को अवास्तविक कह दिया जाता है। 18 की उम्र में अनाथ हुए रजत गुप्ता आईआईटी,
दिल्ली से स्नातक होते हैं, हॉर्वर्ड लंदन में अपनी प्रतिभा सिद्ध करते हैं, अपने परिश्रम,
प्रतिभा और समर्पण के दम पर 1994 में उस कंपनी के एमडी (चीफ एक्जीक्यूटिव) बनते हैं,
जिसमें 1973 में साधारण कर्मचारी की तरह आए थे। रजत गुप्ता भारतीय-मूल के पहले शख्स
थे, जो मैकिन्से जैसी किसी अंतरराष्ट्रीय ख्याति की कंपनी में सीईओ पद तक पहुंचे। पूर्व
अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन उनके अनेक मित्रों में एक रहे हैं। वे यूनाइटेड नेशंस में
सलाहकार रहे हैं और उन्होंने शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी कार्यो के लिए लाखों डॉलर
जुटाए। आज उनकी संपत्ति 84 मिलियन डॉलर की आंकी जाती है। व्यापार और उद्योग जगत में
उनकी ख्याति रही है और आज भी लोग उनकी प्रतिभा के कायल हैं।
आज रजत गुप्ता मात्र 63 वर्ष के हैं और व्यापार जगत में अगले अनेक वर्ष उनके जीवन के स्वणिम वर्ष हो सकते थे। सारे जीवन के परिश्रम के पुरस्कार वर्ष हो सकते थे। हाल ही में न्यूयॉर्क की अदालत में उन पर लगाए आर्थिक अनियमितता के आरोपों में दो मामलों में उनके खिलाफ सबूत हैं कि उन्होंने गोपनीय सूचना व्यापारिक लाभ के लिए दी। सबसे अजीब तथ्य यह है कि उन्हें गुनहगार पाने वाले जूरी सदस्यों में कुछ ने आंसू बहाते हुए कहा कि मन ही मन वे चाहते थे कि रजत गुप्ता पर लगाए आरोप निराधार हों। किसी आरोपी के प्रति इतनी सहानुभूति का प्रदर्शन एक ऐतिहासिक घटना है।
रजत गुप्ता का जीवन ग्रीक त्रासदी के नायकों की तरह है। उनमें अनेक गुण हैं। वह साहसी हैं, ईमानदार हैं, परंतु जाने किन दुर्भाग्यपूर्ण क्षणों में उनके चाहे-अनचाहे कोई एक चूक हो जाती है या उनकी ख्याति व प्रतिभा के कारण ईष्र्यालु प्रतिभाहीन मस्खरेनुमा लोगों का षड्यंत्र उन्हें गलती करने को बाध्य करता है और उनके सारे जीवन का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। कैसे होते हैं ये क्षण, जो हमेशा सजग रहने वाले व्यक्तिसे गलती करा देते हैं? समय की पट्टी पर जाने कैसे फिसलन वाली जगह पर पैर पड़ता है और आदमी शिखर से शून्य हो जाता है?
प्रतिभा बनाम प्रतिभाहीन टुच्चों की जंग पुरानी है। बच्चों के सांप-सीढ़ी वाले खेल को याद कीजिए। सीढ़ियां चढ़ते हुए विजय के 100 अंक के पहले 99 पर आप सांप के मुंह में जाकर बिलकुल नीचे आ जाते हैं। बच्चों के लिए यह खेल गढ़ने वाले ने महान दार्शनिक संकेत खेल में गूंथा है - वह है सांप। प्राय: इच्छा का प्रतीक होता है सांप। याद कीजिए ‘काला बाजार’ में शैलेंद्र का गीत ‘ना मैं धन चाहूं, ना मैं रतन चाहूं, तेरे चरणों की धूल मिल जाए, तो मैं तर जाऊं। मोह मन मोहे, लोभ ललचाए, कैसे-कैसे ये नाग लहराए..।’ जाने कहां अवचेतन के किसी अंधेरे कोने में कोई सांप बैठा होता है, मनुष्य को पता भी नहीं चलता।
महानायकों के साथ दो किस्म के अंत होते हैं। उनकी सफलता के साथ ही कहीं उनके आदर्श भी धराशायी होते हैं और कभी-कभी उनके साथ ऐसे स्वार्थी लोग जुड़ जाते हैं, जो विजय को कलंकित कर देते हैं। महानायक को विरोधी से उतना खतरा नहीं होता, जितना अपने मूढ़ अनुयायी से होता है। जब आपके साथ एक हुजूम चलता है, तब आप सबकी मंशा से परिचित नहीं हो सकते। जय-जयकार के नारों के कारण सांप की सरसराहट नहीं सुन पाते। महानायक भीड़ जुटाता है, उसे मंत्रमुग्ध करता है और जनमत की लहर बनाता है, परंतु उसे अब एकांत नहीं मिलता, भीड़ का एक हिस्सा उसके घर घुस आता है और ‘जी-हजूरी’ की ध्वनियां उसके स्वतंत्र विचार की क्षमता छीन लेती है। इन परिस्थितियों से जन्म लेते हैं वे दुर्भाग्यपूर्ण क्षण। क्रिकेट के मुहावरे में इसे कहते हैं- ‘रनआउट होना’। आपने कभी गलत स्ट्रोक नहीं खेला, परंतु साथी की गफलत या बदनीयत आपको रनआउट कर देती है।
रजत गुप्ता से जो चूक हुई है, वह भारत के शेयर बाजार में अनेक लोगों से अनेक बार हुई है। भीतरी जानकारी देकर शेयर मार्केट में उफान खड़ा करना हमारे यहां हमेशा होता रहा है, परंतु शेयर बाजार नियंत्रित करने वाली संस्था ने कभी बड़े आदमी को कठघरे में नहीं खड़ा किया है। अमेरिका की संस्था और उनका कानून विभाग प्राय: सजग रहा है। वहां भी नियमों का पालन नहीं करने के कारण आर्थिक मंदी आई है। अंतर केवल यह है कि अमेरिकी व्यापार एवं कानून विभाग अपनी गलतियां दोहराता नहीं और हम कभी मौलिक गलती नहीं करते। हमारे यहां उस तरह नियमों का पालन हो तो हमारे समृद्धि के महल ढा जाएंगे।
यह गौरतलब है कि इस घटना के कुछ वर्ष पूर्व अगर १८ वर्ष के अनाथ के कारोबारी दुनिया में शिखर तक पहुंचने और वहां से लुढ़कने पर कोई फिल्म बनती तो उसे अवश्विसनीय और फंतासी कहा जाता। सिनेमा और साहित्य में प्रसिद्ध ग्रीक त्रासदी अब एक आर्थिक अजूबे के रूप में घटित हो रही है- ग्रीस दीवालिएपन की कगार पर खड़ा है। जिंदगी के पास विविध रेशे हैं और वह अफसानानुमा हकीकत रचने में बेमिसाल है।
आज रजत गुप्ता मात्र 63 वर्ष के हैं और व्यापार जगत में अगले अनेक वर्ष उनके जीवन के स्वणिम वर्ष हो सकते थे। सारे जीवन के परिश्रम के पुरस्कार वर्ष हो सकते थे। हाल ही में न्यूयॉर्क की अदालत में उन पर लगाए आर्थिक अनियमितता के आरोपों में दो मामलों में उनके खिलाफ सबूत हैं कि उन्होंने गोपनीय सूचना व्यापारिक लाभ के लिए दी। सबसे अजीब तथ्य यह है कि उन्हें गुनहगार पाने वाले जूरी सदस्यों में कुछ ने आंसू बहाते हुए कहा कि मन ही मन वे चाहते थे कि रजत गुप्ता पर लगाए आरोप निराधार हों। किसी आरोपी के प्रति इतनी सहानुभूति का प्रदर्शन एक ऐतिहासिक घटना है।
रजत गुप्ता का जीवन ग्रीक त्रासदी के नायकों की तरह है। उनमें अनेक गुण हैं। वह साहसी हैं, ईमानदार हैं, परंतु जाने किन दुर्भाग्यपूर्ण क्षणों में उनके चाहे-अनचाहे कोई एक चूक हो जाती है या उनकी ख्याति व प्रतिभा के कारण ईष्र्यालु प्रतिभाहीन मस्खरेनुमा लोगों का षड्यंत्र उन्हें गलती करने को बाध्य करता है और उनके सारे जीवन का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। कैसे होते हैं ये क्षण, जो हमेशा सजग रहने वाले व्यक्तिसे गलती करा देते हैं? समय की पट्टी पर जाने कैसे फिसलन वाली जगह पर पैर पड़ता है और आदमी शिखर से शून्य हो जाता है?
प्रतिभा बनाम प्रतिभाहीन टुच्चों की जंग पुरानी है। बच्चों के सांप-सीढ़ी वाले खेल को याद कीजिए। सीढ़ियां चढ़ते हुए विजय के 100 अंक के पहले 99 पर आप सांप के मुंह में जाकर बिलकुल नीचे आ जाते हैं। बच्चों के लिए यह खेल गढ़ने वाले ने महान दार्शनिक संकेत खेल में गूंथा है - वह है सांप। प्राय: इच्छा का प्रतीक होता है सांप। याद कीजिए ‘काला बाजार’ में शैलेंद्र का गीत ‘ना मैं धन चाहूं, ना मैं रतन चाहूं, तेरे चरणों की धूल मिल जाए, तो मैं तर जाऊं। मोह मन मोहे, लोभ ललचाए, कैसे-कैसे ये नाग लहराए..।’ जाने कहां अवचेतन के किसी अंधेरे कोने में कोई सांप बैठा होता है, मनुष्य को पता भी नहीं चलता।
महानायकों के साथ दो किस्म के अंत होते हैं। उनकी सफलता के साथ ही कहीं उनके आदर्श भी धराशायी होते हैं और कभी-कभी उनके साथ ऐसे स्वार्थी लोग जुड़ जाते हैं, जो विजय को कलंकित कर देते हैं। महानायक को विरोधी से उतना खतरा नहीं होता, जितना अपने मूढ़ अनुयायी से होता है। जब आपके साथ एक हुजूम चलता है, तब आप सबकी मंशा से परिचित नहीं हो सकते। जय-जयकार के नारों के कारण सांप की सरसराहट नहीं सुन पाते। महानायक भीड़ जुटाता है, उसे मंत्रमुग्ध करता है और जनमत की लहर बनाता है, परंतु उसे अब एकांत नहीं मिलता, भीड़ का एक हिस्सा उसके घर घुस आता है और ‘जी-हजूरी’ की ध्वनियां उसके स्वतंत्र विचार की क्षमता छीन लेती है। इन परिस्थितियों से जन्म लेते हैं वे दुर्भाग्यपूर्ण क्षण। क्रिकेट के मुहावरे में इसे कहते हैं- ‘रनआउट होना’। आपने कभी गलत स्ट्रोक नहीं खेला, परंतु साथी की गफलत या बदनीयत आपको रनआउट कर देती है।
रजत गुप्ता से जो चूक हुई है, वह भारत के शेयर बाजार में अनेक लोगों से अनेक बार हुई है। भीतरी जानकारी देकर शेयर मार्केट में उफान खड़ा करना हमारे यहां हमेशा होता रहा है, परंतु शेयर बाजार नियंत्रित करने वाली संस्था ने कभी बड़े आदमी को कठघरे में नहीं खड़ा किया है। अमेरिका की संस्था और उनका कानून विभाग प्राय: सजग रहा है। वहां भी नियमों का पालन नहीं करने के कारण आर्थिक मंदी आई है। अंतर केवल यह है कि अमेरिकी व्यापार एवं कानून विभाग अपनी गलतियां दोहराता नहीं और हम कभी मौलिक गलती नहीं करते। हमारे यहां उस तरह नियमों का पालन हो तो हमारे समृद्धि के महल ढा जाएंगे।
यह गौरतलब है कि इस घटना के कुछ वर्ष पूर्व अगर १८ वर्ष के अनाथ के कारोबारी दुनिया में शिखर तक पहुंचने और वहां से लुढ़कने पर कोई फिल्म बनती तो उसे अवश्विसनीय और फंतासी कहा जाता। सिनेमा और साहित्य में प्रसिद्ध ग्रीक त्रासदी अब एक आर्थिक अजूबे के रूप में घटित हो रही है- ग्रीस दीवालिएपन की कगार पर खड़ा है। जिंदगी के पास विविध रेशे हैं और वह अफसानानुमा हकीकत रचने में बेमिसाल है।
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