गुरुवार, 5 जुलाई 2012

उड़ जा रे पंछी..तेरा देश बुलाये रे..


रोजाना सुबह उठकर जब तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलता हूँ तो मेरी सोच के पंछी खुले आसमान की शुद्ध हवा में उड़ान भरते ना जाने किस किस देश में उड़ के आ जाते हैं. और अगर कही लोकल ट्रेन में खिड़की वाली जगह बैठने मिल गयी तो ये पंछी वापस आने का नाम भी नहीं लेते. गुमराह से किसी दूसरी दुनिया में भटक कर भी सही रास्ते पहुंचना एक अजीब सा अहसास है. लेकिन ये पंछी उस वक़्त घायल हो जाते हैं जब वो स्टेशन आता है जहां उतरकर मुझे ऑफिस जाना है नौकरी पर. मेरी ड्यूटी पर. 

बहरहाल, आज बड़े भाई ने फ़ोन पे बात के दौरान बड़ी ही अच्छी लाइन सुना दी. वो कुछ इस तरह हैं:
"तुम अपने दोस्तों के नाम तो गिनाओ, मैं अपने दुश्मनों की तादात जान लूं!"

आज ही "गाड पार्टिकल"  के बारे में पढ़ा की किस तरह सत्येन्द्र नाथ बोस के काम के आधार पर इन पार्टिकल्स का नाम "हिग्ग्स बोसन" पढ़ा और किस तरह श्रीमान बोस का नाम इस पूरी "बिग बंग" खोज में नहीं लिया जा रहा. मैंने भी विज्ञान पढ़ा है पर बाद में रोजी रोटी के सिलसिले में लगने के बाद विज्ञान मस्तिष्क से ओझल हो गया है. एक बात समझ से परे है कि विज्ञान कि इस खोज को क्यों इतना महत्व दिया जा रहा है. क्या इस खोज से हम दूसरी किसी सृष्टि का निर्माण कर पायेंगे जो सर्व सुखी हैं.. 

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