गुरुवार, 27 सितंबर 2012

तुकबंदी


कल ऐसे ही अनजाने में तुकबंदी हो गयी:- 

(1) 
दफ्तर में सब उचक्के हो रहे हैं.
काम दूसरों के सिर डालकर निठल्ले हो रहे हैं.
कार्पोरेट के लिए करके काम,
खुद ही भौचक्के से हो रहे हैं.

(2)
ये सपने है जो अपने नहीं है 
और
जो अपने है वो सपने नहीं है.

(3)

जनता की सरकार,
सभी नेताओं के पास है कार,
जनता हुई बेकार/ बेघरबार,
लोकतंत्र हुआ भीडतंत्र./भ्रष्टतंत्र,
जनता फिर हुई परतंत्र.

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