भारत
में सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होना एक मौक़ा है इससे जुड़ी कुछ अनमोल यादों को ताज़ा
कर लेने का। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आज से सौ बरस पहले यानी सन 1913 में भारत
पर ग़ुलामी की भयानक बेडियां कसी थीं। 1857 के विद्रोह को नाकाम हुए भी आधी सदी से
ज़्यादा वक्त बीत चुका था। फ्रांस के ल्यूमियेर ब्रदर्स ने ‘सिनेमेटोग्राफ’ का आविष्कार
किया और उससे तैयार की गयी अपनी पहली फिल्मों को 28 दिसंबर 1895 को पेरिस के एक कैफे
में सार्वजनिक रूप से दिखाया। 7 जुलाई 1896 को उन्होंने बॉम्बे के वाटसन होटेल में
अपनी इन फिल्मों का प्रदर्शन किया। तब किसी को अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा कि एक दिन
अरब सागर के किनारे बसा ये शहर फिल्मों का ऐसा गढ़ बन जायेगा, जहां हर साल दुनिया
की सबसे ज्यादा फिल्में बनाई जायेंगी।
दादा साहेब फालके से भी पहले सावे दादा यानी हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर ने मुंबई में लघु फिल्मों का निर्माण किया था। जब मुंबई में ल्यूमियेर ब्रदर्स की फिल्में प्रदर्शित की गयीं, तब तक सावे दादा को फोटोग्राफी के व्यवसाय में तकरीबन पंद्रह साल हो चुके थे। उन्होंने इंग्लैंड से तब का मूवी-कैमेरा यानी सिनेमेटोग्राफ़ मंगवाया। उन्होंने इससे कुछ ‘न्यूज़-रील’ फिल्माईं। मुंबई के प्रसिद्ध हैंगिंग-गार्डन में उस समय के दो मशहूर पहलवानों पुंडलीक दादा और कृष्णा नाहवी के बीच हुए कुश्ती के मुक़ाबले को फिल्माया। उस समय फिल्म को प्रोसस होने के लिए इंग्लैंड भेजा जाता था। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग विषयों पर कुछ और फिल्मांकन किए। जिनमें से कुछ को भारत के पहले वृत्तचित्र माना जाता है। ठीक इन्हीं दिनों कोलकाता में फोटोग्राफर हीरालाल सेन ने एक ओपेरा ‘द फ्लावर ऑफ पर्शिया’ के एक दृश्य ‘द डान्सिंग सीन’ को फिल्माया। अब तक छोटी-मोटी घटनाओं का फिल्मांकन तो हो रहा था पर कथाचित्र बनाने की कोई कोशिश नहीं की गयी थी।
दादा साहेब फालके से भी पहले सावे दादा यानी हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर ने मुंबई में लघु फिल्मों का निर्माण किया था। जब मुंबई में ल्यूमियेर ब्रदर्स की फिल्में प्रदर्शित की गयीं, तब तक सावे दादा को फोटोग्राफी के व्यवसाय में तकरीबन पंद्रह साल हो चुके थे। उन्होंने इंग्लैंड से तब का मूवी-कैमेरा यानी सिनेमेटोग्राफ़ मंगवाया। उन्होंने इससे कुछ ‘न्यूज़-रील’ फिल्माईं। मुंबई के प्रसिद्ध हैंगिंग-गार्डन में उस समय के दो मशहूर पहलवानों पुंडलीक दादा और कृष्णा नाहवी के बीच हुए कुश्ती के मुक़ाबले को फिल्माया। उस समय फिल्म को प्रोसस होने के लिए इंग्लैंड भेजा जाता था। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग विषयों पर कुछ और फिल्मांकन किए। जिनमें से कुछ को भारत के पहले वृत्तचित्र माना जाता है। ठीक इन्हीं दिनों कोलकाता में फोटोग्राफर हीरालाल सेन ने एक ओपेरा ‘द फ्लावर ऑफ पर्शिया’ के एक दृश्य ‘द डान्सिंग सीन’ को फिल्माया। अब तक छोटी-मोटी घटनाओं का फिल्मांकन तो हो रहा था पर कथाचित्र बनाने की कोई कोशिश नहीं की गयी थी।
ये
प्रयास सन 1912 में किया गया। सावे दादा ने निजी कारणों से अपना कैमेरा बेच दिया था।
जिससे ए.पी.करिन्दकर, एस.एन.पाटनकर और वी.पी.दिवेकर ने 1000 फिट लम्बी एक छोटी कथा-फिल्म
‘सावित्री’ बनाई। तकनीकी कारणों से ये फिल्म प्रदर्शित ना हो सकी। इन्हीं दिनो मुंबई
के नानाभाई चित्रे के प्रयासों से ‘पुंडलीक’ नामक एक नाटक को फिल्माया गया। आठ हज़ार
फुट लंबी इस फिल्म को मुंबई में प्रदर्शित भी किया गया। पर भारत की पहली फीचर फिल्म
बनाने का श्रेय गया धुंडीराज गोविंद फालके को। जो एक ज़माने में अपना प्रिंटिंग-प्रेस
भी चलाते थे। पर साझेदारों से विवाद की वजह से उन्होंने ये काम बंद कर दिया और फिल्म
बनाने के अपने सपने को पूरा करने में जुट गये। दरअसल उन दिनों मुंबई में मानिक सेठना
नामक एक उद्योगपति ‘टूरिंग सिनेमा कंपनी’ के ज़रिये बाहर से फिल्में मंगवाकर उन्हें
किसी हॉल में नहीं बल्कि खुले मेदानों में पेशेवर रूप से प्रदर्शित करते थे। क्रिसमस
पर ऐसे ही एक प्रदर्शन में दादा साहेब फालके ने एक मूक फिल्म देखी ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट‘
जिससे उन्हें सिनेमा बनाने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एक दोस्त के पास अपनी इंश्योरेन्स
पॉलिसी गिरवी रखी और क़र्ज़ लेकर इंग्लैंड गये ताकि सिनेमा बनाने के ज़रूरी उपकरण
ख़रीदें और प्रश भी लें। ईसा-मसीह पर देखी फिल्म से उन्हें प्रेरणा दी कि वो भारतीय
पौराणिक विषयों पर फिल्म बनायेंगे। इस तरह ‘राजा हरीश्चंद्र’ का बीज पड़ा। तमाम बाधाओं
को पार करते हुए दादा साहेब फालके ने 3 मई 1913 को अपनी इस फिल्म को प्रदर्शित किया।
क़रीब 3700 फुट लंबी यानी चार रील की इस फिल्म को मुंबई के कोरोनेशन सिनेमा में प्रदर्शित
किया गया और इस तरह फालके की परेशानियों का दौर ख़त्म हो गया। आपको बता दें कि फालके
के इसी संघर्ष पर मराठी फिल्मकार परेश मोकाशी ने सन 2010 में अपनी फिल्म ‘हरीश्चंद्राची
फैक्ट्री’ बनाई थी। इस फिल्म को ऑस्कर पुरस्कारों तक भेजा गया था।
आपको
बता दें कि दादा साहेब फालके को ‘राजा हरीश्चंद्र’ के लिए महिला कलाकार नहीं मिले
थे। इसलिए सालुंके नामक एक नौजवान को तारामती की भूमिका दी गयी थी। भारतीय फिल्मों
की पहली अभिनेत्री बनीं कमलाबाई गोखले जिन्होंने 1914 में आई दादासाहेब फालके की तीसरी
फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में काम किया था। आज के ज़माने के मशहूर अभिनेता विक्रम
गोखले उन्हीं के पोते हैं। अब बात कर ली जाये टॉकीज़ों की। जैसा कि हमने बताया कि
शुरूआत में फिल्में किसी हॉल या मैदान में दिखा दी जाती थीं। भारत का पहला स्थाई
सिनेमाहॉल सन 1907 में जे.एफ.मदान ने बनाया था, जिसका नाम था एलफिन्स्टन पिक्चर
पैलेस। बाद में ये चैप्लिन सिनेमा के नाम से जाना गया।
भारत
में सिनेमा ने बोलना शुरू किया आर्देशिर ईरानी की फिल्म ‘आलम-आरा’ से, इसके नायक थे
मास्टर विट्ठल और नायिका थीं जुबेदा। 14 मार्च 1931 को ये फिल्म मुंबई के मैजेस्टिक
थियेटर में प्रदर्शित की गयी थी। इस फिल्म में वज़ीर मुहम्मद ख़ान ने भारतीय सिने
इतिहास का पहला गाना गाया—‘दे दे ख़ुदा के नाम पर, गर ताक़त हो देने की’। इसी फिल्म
में ज़ुबेदा ने गाया—‘बदला दिलवायेगा यारब तू सितमग़ारों से’। इन गानों की रिकॉर्डिंग
तो उपलब्ध नहीं है पर बाद में किसी इंटरव्यू में जुबेदा ने इस गीत को गुनगुनाया था,
उसकी रिकॉर्डिंग ज़रूर उपलब्ध है। आर्देशिर ईरानी को भारत की पहली रंगीन फिल्म बनाने
का श्रेय भी जाता है। उन्होंने सन 1937 में 137 मिनिट लंबी कलर फीचर फिल्म ‘किसान
कन्या’ बनाई थी। हालांकि भारत में रंगीन सिनेमा बनाने का चलन काफी देर से शुरू हुआ।
लंबे समय तक फिल्में श्वेत-श्याम ही रहीं। यहां ये बता देना ज़रूरी है कि वी. शांताराम
ने सन 1933 में ‘सैरन्ध्री’ बनाई थी। पर इसकी प्रोसेसिंग भारत में नहीं जर्मनी में
की गयी थी। सन 1932 में आई मदन थियेटर्स की फिल्म ‘इंद्रसभा’ भारत में सबसे ज्यादा
गानों वाली फिल्म मानी जाती है। इसमें कुल 71 गाने थे। मास्टर निसार और कज्जन के
अभिनय वाली इस फिल्म के निर्देशक थे जे.जे.मदान। संगीतकार थे नागरदास नायक। भारत की
पहली सिनेमास्कोप फिल्म थी सन 1959 में आई गुरूदत्त की ‘काग़ज़ के फूल’।
तीसरे
और चौथे दशक में मुंबई, कोलकाता और चेन्नई भारत में फिल्में बनाने के मुख्य केंद्र
बन चुके थे। बी. एन. सरकार के ‘न्यू थियेटर्स’ कोलकाता ने इस दौर में ‘चंडीदास’
(1934/निर्देशक नितिन बोस/कलाकार कुंदनलाल सहगल और उमा शशि), ‘देवदास’ (1935/निर्देशक
पी.सी.बरूआ/कलाकार कुंदनलाल सहगल, जमुना), कपाल कुंडला (1939/निर्देशक नितिन बोस/ कलाकार
शैलेन चौधरी और लीला देसाई) और मुक्ति (1937/निर्देशक पी.सी.बरूआ/कलाकार कानन देवी,
पी आ) जैसी फि बना ली थीं। जबकि मुंबई में हिमांशु रॉय की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ ने ‘जीवन
नैया’ (1936/निर्देशक फ्रेंज ऑस्टिन) और ‘अछूत कन्या’ (1936 निर्देशक फ्रेंज ऑस्टिन)
जैसी फिल्में प्रदर्शित कर ली थीं। स्टूडियो सिस्टम स्थापित हो गया था। कुंदनलाल
सहगल, अशोक कुमार, देविका रानी, दिलीप कुमार जैसे स्टार सामने आने लगे थे। इसके अलावा
सरस्वती देवी, आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और खेमचंद प्रकाश जैसे संगीतकारों ने अपने
क़दम बढ़ाने शुरू कर दिये थे। यानी इतना तय हो गया था कि अब भारतीय सिनेमा तरक्की
की राहों पर जाने वाला है।
लेखक
विविध-भारती में कार्यरत हैं।
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