जीने के
कई कारण हो सकते हैं और मरने के लिए चंद बहाने काफी हैं। आज के युग में यह संवेदनहीनता
ही है कि लोग शर्म से भी नहीं मरते और सम्मान से भी नहीं जीते, केवल जीने का स्वांग
करते हैं। हम सब लाइफ-लाइफ खेल रहे हैं।
महाभारत के अनुशासन पर्व में एक कथा इस प्रकार की है कि ऋषि देवशर्मा को अपनी सुंदर पत्नी रुचि
की रक्षा की चिंता है। उन्हें भय है कि इंद्र उनकी पत्नी पर मोहित हो सकते हैं। एक
बार यात्रा पर जाते समय वह शिष्य विपुल पर रुचि की रक्षा का भार डालते हैं। विपुल इंद्र
को आते देख यह जानते हुए भी कि वह इंद्र का सामना नहीं कर पाएगा, गुरुपत्नी की आंखों
में झांकते हुए अपनी ऊर्जा उनके अवचेतन में प्रवाहित कर देता है और इंद्र के आने पर
रुचि के माध्यम से विपुल की आवाज ही गूंजती है। इंद्र समझ जाते हैं कि विपुल ने रुचि
के सारे अवचेतन और शरीर पर कब्जा जमा लिया है और वह वापस लौट जाते हैं। विपुल अपने
गुरु से कैसे कहे कि रक्षा का केवल यही उपाय था कि वह गुरुपत्नी की चेतना में पैठ जाए,
परंतु यह भी एक किस्म का सहवास है और शायद उस क्रिया का शिखर है।
गुरु कहते हैं कि किसी भी कार्य के परिणाम का आकलन इस पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का उद्देश्य क्या है, उसकी नीयत क्या है! विपुल द्वारा गुरुपत्नी की रक्षा के लिए किए गए प्रयास को पाप नहीं कहा जा सकता। स्पष्ट है कि अवचेतन पर अधिकार के प्रयोग सदियों से हो रहे हैं।
गुरु कहते हैं कि किसी भी कार्य के परिणाम का आकलन इस पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का उद्देश्य क्या है, उसकी नीयत क्या है! विपुल द्वारा गुरुपत्नी की रक्षा के लिए किए गए प्रयास को पाप नहीं कहा जा सकता। स्पष्ट है कि अवचेतन पर अधिकार के प्रयोग सदियों से हो रहे हैं।
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