एक शहर का बदलना बहुत बड़ी घटना होती है। यह केबल भव्य गगनचुम्बी इमारतों से स्पष्ट नहीं होता। सड़कों के चौड़ा होने से पता नहीं चलता, तवायफों और दलालों की बढ़ती मांग से जरुर कुछ आभास होता है, परन्तु असली परिवर्तन तो यह है कि सीमेंट की सड़कों से सख्त पडोसी का दिल हो जाए और जनाजे में केबल निकट रिश्तेदार ही बेमन से शामिल हों- संवेदनाओं के घटने से जाहिर हो जाता है कि ये महानगर है।
जब आपके घरों से अधिक लोग सड़कों पर सोते नज़र आयें, भिखारियों की संख्या बढ़ जाए, समझ लीजिये आपका शहर महानगर हो गया है। जब मनुष्य के व्यव्हार में क्रूरता आ जाए और मानवतावादी संस्थाएं खंडहर नज़र आयें, जब शहर कभी सोए ही नहीं, समझ लीजिये वह व्यस्क हो गया, महानगर हो गया।
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