वैसे तो मैं तकनीक के सीमित इस्तेमाल के पक्ष में हूँ पर ना जाने क्यों जब कभी इन्टरनेट पर बैठता हूँ तो स्वयं की इस सोच से इत्तेफाक नहीं रख पाता.आज सुबह ऐसे ही इन्टरनेट पर कुछ खोज रहा था. रास्ता भटक गया. पर जब अरुण कमल की ये कविता हाथ लगी तो लगा कि भटके हुए रास्ते पर भी मंजिल मिल जाती है.
इस नए बसते इलाके में
जहाँ रोज़ बन रहे हैं नये-नये मकान
मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढहा हुआ घर
और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंज़िला
और मैं हर बार एक घर पीछे
चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता
यहाँ रोज़ कुछ बन रहा है
रोज़ कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसन्त का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे बैशाख का गया भादों को लौटा हूँ
अब यही उपाय कि हर दरवाज़ा खटखटाओ
और पूछो
क्या यही है वो घर?
समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर
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