शनिवार, 2 जून 2012

क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये..


कल कहीं से ये लाइन पढने को मिली..

..हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये..

कीर्ति भैया ने कुछ और पंक्तियाँ भेजी:-

मौत ने ज़माने को ये समा दिखा डाला
कैसे कैसे रुस्तम को खाक में मिला डाला
याद रख सिकन्दर के हौसले तो आली थे
जब गया था दुनिया से दोनो हाथ खाली थे अब

ना वो हलाकू है और ना उसके साथी हैं
जंग जो न पोरष है और न उसके हाथी हैं

कल जो तनके चलते थे अपनी शान\-ओ\-शौकत पर
शमा तक नही जलती आज उनकी क़ुरबत पर
अदना हो या आला हो सबको लौट जाना है \- २
मुफ़्हिलिसों का अन्धर का कब्र ही ठिकाना है \- २ 

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