कल मेरे एक मित्र ने अनायास ही फ़ोन करके मेरे से अन्ना आन्दोलन की मौत
के बारे में बात करना चाही..मेरे वो मित्र फेसबुक पर बहुत सक्रिय है..देश और दुनिया
की हर खबर पर इन्टरनेट के माध्यम से खबर रखते हैं..मैंने उनसे सिर्फ इतना जानना चाहा
की अन्ना आन्दोलन के जिन्दा रहने से या मर जाने से उन्हें क्या फरक पढता है? उनके पास इसका कोई उत्तर नहीं था..दरअसल अन्ना आन्दोलन
के पहले चरण में जो भीड़ इक़ट्ठी हुई थी वो भीड़ ही थी जबकि आन्दोलन भीड़ के भरोसे
नहीं चलता..शायद दुसरे और तीसरे मुंबई और अंतिम चरण में जो लोग आये उतने ही लोग सच्चे
अर्थों में अन्ना आन्दोलन से जुड़े थे..मैंने ऐसे कई लोगों को देखा जिन्होंने अन्ना
से जुड़े हर कमेन्ट को पसंद किया किया..फेसबुक पे...और उन तमाम सोशल नेट्वोर्किंग
साईट पर जिस पर कभी कोई भी आन्दोलन सफल ना हो पाया और ना ही होगा...दरअसल आन्दोलन कभी
भी वर्चुअल नहीं हुआ और किसी भी आन्दोलन के लिए सड़क पर लोगों को उतरना पड़ा है और कुर्बानियां
देना पड़ी हैं..इतिहास के तमाम अध्याय जिनमें क्रांतियों का विवरण है कभी भी घर के ड्राईंग
रूम में बैठकर टी वी देखते हुई नहीं हुई..जो आज अन्ना आन्दोलन के समय देखने मिला..तमाम
दूर लोगों ने घर के टी वी सेट पर इसे देखा, पसंद किया पर इसके लिए घर से बाहर ना निकले..और
यही ये आन्दोलन सिर्फ अन्ना, अरविन्द और उनकी टीम तक सिमट गया..
दरअसल आर्थिक उदारवाद की लहर ने इस देश की जनता को आर्थिक रूप से मजबूती
दी पर मानसिक रूप से गुलामी दी है...आज लोग विरोध करना ही भूल गए हैं...जबकि विरोध
करना किसी भी लोकतंत्र का गुण है...लोग सुविधाओं के जंजाल में इस तरह उलझ गए है की
उनके उपभोग तक ही सीमित रह गए हैं...ऐसा नहीं है की वो किसी चीज को समझते नहीं या समझना
नहीं चाहते...अगर ऐसा होता तो इतने सारे टीवी न्यूज़ चैनल और अखबार बंद हो जाते..लोगों
को अपनी सुरक्षा का भी भय है जिसके कारण वो सड़कों पर नहीं उतर पा रहे है...
अन्ना आन्दोलन की समाप्ति से एक बात सरकार ने तय करा दी की वो अंधी है
और बहरी भी है पर गूंगी नहीं है क्योंकि अन्ना आन्दोलन की समाप्ति पर सरकार के सभी
नुमाइनदे वाचाल है..अन्ना आन्दोलन की बिना निष्कर्ष समाप्ति से अन्ना की हार नहीं
हुई है वरन सरकार की हार हुई है जिसे विरोध के स्वर सुने ना दिए...अगर टीम अन्ना पार्टी
बनाकर चुनाव लडती है तो इससे सरकार और उन् तमाम राजनैतिक पार्टियों को टक्कर मिलेगी
जो जनता को सिर्फ भीड़ या वोट समझते है..ये समाप्ति नहीं शुरुआत है..हालाकि
चुनौतियां कम नहीं हैं...जो भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ साबित होगा.. और राजनेताओं
और राजनैतिक पार्टियों को बताएगा की चुनाव इस तरह भी लड़े जाते है और जीते जाते हैं..
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