मंगलवार, 11 सितंबर 2012

असीमित अधिकारों की सीमा

भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है और इसमें अपने नागरिकों को दिए गए अधिकारों का लिखित रूप से वर्णन है..अधिकार "असीमित" हैं अर्थात सामान्यतया ऐसी कोई भी रोक टोक नहीं है जब तक कि उससे देश कि मूलभूत संरचना को ठेस ना पहुंचे..इन दिए गए अधिकारों के कारण ही आज भारत देश कि नीव मजबूती से कड़ी है..लोग सत्याग्रह और आन्दोलन से अपनी बात सरकार के सामने रखते हैं और इस तरह किसी भी प्रकार कि "खूनी क्रांति" इस देश ने नहीं देखी जो लीबिया जैसे देशों मैं हुई है....हमारे इस देश की वर्तमान स्तिथि ये है की ये लगभग अराजकता के माहौल में जी रहा है..ना जाने क्यों इस विस्फोटक माहौल में एक शांति सी छाई है जो शायद तूफ़ान के आने के पहले की सी लगती है!! बोलने का अधिकार संविधान में नागरिकों को है जो हरेक लोकतंत्र की नीव है..बोलते समय कई बातें अच्छी बोली जाती हैं और कई बातें ख़राब लग जाती है..

रहा सवाल असीम त्रिवेदी के बनाये गए कार्टून का तो उन्होंने अपने कार्टून से सिर्फ अभिव्यक्त किया है कि आज इस देश का माहौल क्या है..हमारे देश कि संसद कुछ भी काम करने में असमर्थ है..और भ्रष्टाचार से घिरे इस देश के नेताओं ने अपनी मर्यादा कि सभी सीमायें ख़तम कर दी हैं और ऐसे माहौल में देश का प्रतीक चिन्ह भी शर्मसार है..क्या हम कभी कार्टून को उस अर्थ में समझ सकते हैं जिस अर्थों में उसे व्यक्त किया गया है..ये बात निश्चित है कि अगर "असीम त्रिवेदी" ने अपनी बात लेख के जरिये कही होती तो इतना बबाल ना होता..अतः हमें ऐसी बुद्धि की आवश्यता है की हम बात को उस अर्थों में समझें जिसमें वो कही गयी है..

एक कार्टून पर इस देश में जिस तरह से प्रतिक्रिया हुई है वो शायद कुछ ज्यादा ही है..पूरे तंत्र ने जिस तरह से इस पर प्रतिक्रिया दी है उससे लगता है कि शायद सरकार ऐसे सब अनावश्यक कामों से जनता को सबक देना चाहती है कि आने वाले समय में बोलने और कहने पर और भी पाबंदियां आ सकती हैं..ऐसे समय पर मुझे कहीं पढ़ी हुई ये पंक्तियाँ याद आती है:-"तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की, कि ये एहतियात जरुरी है इस बहर के लिए"

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